Tuesday, 29 March 2011

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Monday, 21 February 2011

॥ श्री काली दीन जी ॥


 ॥ श्री काली दीन जी ॥

पद:-
मन तुम प्रेत समान सतावत।
सुमिरन पाठ कीर्तन पूजन में हमको बिलगावत।
नाच तमाशा स्वांग बिषय में तब कहुँ भागि न जावत।
नीक कहैं नेकों नहिं समुझत ऊपर डाँट सुनावत।
का नुकसान कीन तुमरा हम कहि क्यों नहिं समुझावत।५।

गर्भ में जौन करार किह्यो संघ सो मिलि नाहिं चुकावत।
अब नहिं चले जबरदस्ती यह श्री गुरु ढिग हम जावत।
राम नाम बिधि जानि लेय तब देखैं कहां लुकावत।
मित्र भाव आखिर तब करिहौ अब ही पास न आवत।
लै परकाश ध्यान धुनि पैहौ जो भव ताप नसावत।१०।

सीता राम रहैं नित सन्मुख जो सब में छबि छावत।
काली दीन कहैं यह मारग भाग्यवान कोइ पावत।१२।

दोहा:-
मन तोता मानै नहीं काटै फल बहु धाय।
भूखा ज्यों का त्यों रहै निज स्वभाव नहिं जाय।१।
मन मर्कट मानै नहीं घूमै डारै डार।
चोट खाय गिरि फिर चढ़ै निज स्वभाव उर धार।२।
श्री गुरु बिन नहिं होय बस कहते काली दीन।
चंचलता या की कठिन जानि नाम जप लीन।३।








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पलटू साहब के पद


दोहा:-
पलटू उधर को पलटिगे उधर इधर भा एक।
सतगुरु से सुमिरन सिखै फरक परै नहिं नेक।१।

चौपाई:-
फरक परे नहिं नेक शब्द पै सूरति दीन्हे।१।
ध्यान धुनी परकास दसा लै रूप को चीन्हे।२।
सुर मुनि आशिष देंय भये निज कुल परवीने।३।
पलटू कह तन त्यागि अचलपुर बासा लीन्हे।४।

दोहा:-
आपै आपको जानते आपै का सब खेल।
पलटू सतगुरु के बिना ब्रह्म से होय न मेल।१।

चौपाई:-

ब्रह्म से होय न मेल कथैं संतन की बानी।
लोग कहैं है सिद्ध राह निज पुर की जानी।२।
जग में खातिर होत अंत में हो हैरानी।
पलटू सतगुरु शरनि बिना अंधे अज्ञानी।३।

चौपाई:-
जीवन मुक्त जियति सब जाना। तब हो भक्त रूप भगवाना॥
सतगुरु का प्रथमै करि ध्याना। तब घट भीतर घुस के छाना॥
जो कोइ भजन कि बिधि को जाना।
वा से यह सब बात बताना॥
शुद्ध धान्य है भजन खजाना। पलटू कह साधक हो दाना।४।

पद:-
सतगुरु करो मारग मिलै बनि दीन सच्चे दास हो।
दो बजे निशि में उठो साधन में बारह मास हो।
सिद्धांत सब सुना का पड़ी तब दुख भव का नास हो।
अनहद सुनो अमृत पियो हानि नाम लै परकास हो।
नागिनि जगै चक्कर चले कमलन क उलटि विकास हो।५।

सुर मुनि मिलैं उर में लगा बोले भजन में पास हो।
खट रूप का तस रीफ लाना सामने में खास हो।
अंधे कहै तन त्यागि लो निज वतन में वास हो।८।